चिराग़ कयी झिलमिलाएँगे 

मैं शाम अक्सर हारे बैठ जाता हूँ सुबह की तलाश में। मैं रोज़ जाम कयी ख़त्म कर जाता हूँ, एक अनजानी सी प्यास में।  हूँ मुख़ातिब हर बुराई से जहाँ की पर मयस्सर मैं हो जाता हूँ अच्छाई के ख़्वाब से। यूँ तो हूँ शांत एक बूझी हुई लौ के धूँए सा मैं इस अंधेरे … Continue reading चिराग़ कयी झिलमिलाएँगे 

शहर है मेरा भी 

मैं बूझते उजाले की लौ बन बैठूँगा मैं तेरी वादियों की तनहैयाँ दूर तक समेटूँगा।  कल गर क़ाबिल हुआ तो ही वापिस लौटूँगा तेरा ज़र्रा समेटे जिंदिगी की दौड़ दौड़ूँगा।  चाहे क़ाबिज़ जहाँ हो जाऊँ आशियाँना तू होगा,  मकान चाहे जहाँ बनाऊँ मेरा घर तू होगा।  रंग चाहे जहाँ का चढ़ाऊँ मिट्टी मेरी तू होगा,  कल … Continue reading शहर है मेरा भी