26/11/2008

Though the ink is blue But red was its colour For this is a saga of terror and valour All there was chaos Terror being everywhere people were on double Panic being set there Bullets buzzing around & about Found many on the target For 60 hrs all was blood and gore a scene no … Continue reading 26/11/2008

मेरी कामत के चर्चे शहर के हर कूचे में थे मकाँ, हमसे किसी के ऊँचे ना थे था ग़ुरूर हमको भी अपनी ज़रा नावाज़ी का अंज़ूमन में होते हैं चर्चे कहना था ख़बरसाजी का हुआ कुछ यूँ था उस दिन महफ़िल सजी एक ख़ास थी अंदर रंगिनिया थी और बाहर क़यामत-ए-बारिश की रात थी जुगलबंदी … Continue reading

मेरी कामत के चर्चे शहर के हर कूचे में थे मकाँ, हमसे किसी के ऊँचे ना थे था ग़ुरूर हमको भी अपनी ज़रा नावाज़ी का अंज़ूमन में होते हैं चर्चे कहना था ख़बरसाजी का हुआ कुछ यूँ था उस दिन महफ़िल सजी एक ख़ास थी अंदर रंगिनिया थी और बाहर क़यामत-ए-बारिश की रात थी जुगलबंदी … Continue reading

Yet the solace it finds!

You never know what Brews in a teenage mind The one which is agitated And trying to unwind To express and then Not to find words And the raised lumps Chocking vocal chords The rainbows of hope Peeping through misty eyes And to steal a glance To your face it often pries And shudders my … Continue reading Yet the solace it finds!

वो दस रुपय का नोट भी फड़फड़ाता है ख़र्च होने नख़रे दिखाता है ठेले पर देख गुपचुप ललचाता है देख कोई ऑटो वो चिल्लाता है मिलों चल संग मेरे फिर सकुचाता है फटी जेब में अपना वजूद छिपाता है छन्द पंक्तियों में बिखरा में वो नोट आज भी फड़फड़ाता है