वो दस रुपय का नोट भी फड़फड़ाता है ख़र्च होने नख़रे दिखाता है ठेले पर देख गुपचुप ललचाता है देख कोई ऑटो वो चिल्लाता है मिलों चल संग मेरे फिर सकुचाता है फटी जेब में अपना वजूद छिपाता है छन्द पंक्तियों में बिखरा में वो नोट आज भी फड़फड़ाता है

भ्रम में बिताया हुआ जमाना

आज फिर से खोज रही हूँ ख़ुद को समय दे रही हूँ अपनी कलम को ज़िन्दगी की कश्मकश में भटक गई थी फिर से गढ़ रही हूँ उस अधूरे ख्वाब को झूठी हँसी के चलते दिल से मुस्कुराना भूल गई थी सब की भावनाओं को समजते खुद की आशाएँ भूल गई थी बनना चाहती थी … Continue reading भ्रम में बिताया हुआ जमाना