जाने क्या मन ढूंढ रहा

खुलती हुई कलियों में , उन भूली बिसरी गलियों में ओस की उन बूंदों में उचटती अकेली नींदों में जाने क्या मन ढूंढ रहा उड़ते हुए परिंदो में पर्वत के रिन्दों में सागर की उठती लहरों में उजड़े हुए शहरों में जाने क्या मन ढूंढ रहा नदियों की होती कलकल में सन्नाटे के हर पल … Continue reading जाने क्या मन ढूंढ रहा