आज भी है

कितने बरस बीत गए तरसती नज़र क्यों आज भी है रास्ते ही अलग हो गए तो दिल में क्यों धड़कते आज भी है खुली किताब हूँ मैं पर दफन मेरे सीने में कुछ राज़ क्यों है दरख़्त कबके सूख गए बाग़ मेंखुशबू क्यों आज भी है निशां न हो एक भी लेकिन जख्मों में 'मुंतशिर' … Continue reading आज भी है