तेरे प्यार पर अब भी है इख्तियार उनका 💕


लबों पर आती थी बिन बुलाए मुस्कुराहट
जो महफ़िल में ज़िक्र होता था उनका

उन सोखियो -ए – तबस्सुम के मरासिम क्या बताएँ
दिन अच्छा गुज़रता, गर दीदार होता था उनका

बिछड़ना उनका हमारा कोई नई बात नहीं
पास लाके दूर जाना दस्तूर है उनका

ज़ोर-ए-आज़माइश बखूबी कर रहे हैं वो
दिल गोया पत्थर हो गया हो उनका

हिचकियाँ कुछ कम हो गयी हैं
नये शहर में शायद मन लग गया उनका

गैर हो गये हैं आज वो इस कदर
कासिद से हाल मालूम होता है अब उनका

तकल्लूफ और ना कर, “मुंतशीर” अब तू
क्या यह कम है तेरे प्यार पर अब भी है इख्तियार उनका

~”मुंतशीर”

A brilliant writeup Prankies

  • Kya baat hai👌👌
    Your poem perfectly conveys how a complaining heart can remain satisfied❤️

    Keep scribbling

    Yours loving warrior
    Naina

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