किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की – 3


न झर रही, न झर चुकी है

पंखुड़ियाँ  इस गुुलाब की

तो क्या ज़रूरत है ऐ जानिब

इन  ‘अश्कों के सैलाब’ की..




बात बचपन में पढ़ी थी

‘सुखों के जिस तालाब’ की

हैं हमेशा संग हमारे

किरणे  ‘उस’ (आपके)  आफ़ताब की..


मिल के संग,  नित बढ़ते चलेंगे

है बात ये उनके ख्वाब की

हमेशा हैं संग हमारे

किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की..


होती ज़रूरत उनको नहीं कभी

किसी दिखावे,  किसी नक़ाब की

‘आशुसुधा’  संग जिनके हमेशा

किरणे  ‘आपके’  आफ़ताब की!!!

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5 thoughts on “किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की – 3

  1. Actually ye lines Maine likhi thi, warrior ki Kavita k comment pe,
    Jisko warrior ne alag se post krne bola…
    किरणे आपके आफ़ताब की 2 ke naam se

    Liked by 1 person

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