किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की – 3

न झर रही, न झर चुकी है पंखुड़ियाँ  इस गुुलाब की तो क्या ज़रूरत है ऐ जानिब इन  'अश्कों के सैलाब' की.. बात बचपन में पढ़ी थी 'सुखों के जिस तालाब' की हैं हमेशा संग हमारे किरणे  'उस' (आपके)  आफ़ताब की.. मिल के संग,  नित बढ़ते चलेंगे है बात ये उनके ख्वाब की हमेशा हैं संग हमारे किरणें  'आपके' आफ़ताब … Continue reading किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की – 3