Ramdhari Singh Dinkar


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जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

  • Dinkar

Today, I lift my pen to pay my heartiest tribute to hail one of the greatest Hindi poet of all time, who by his fans is regarded as Rashtra Kavi. A Freedom Fighter, a gandhian, a social activist a poet and a Rajya Sabha MP, he was born on 23rd of September, 110 years ago in Munger district of Bihar. Born and brought up is a rustic environment with meagre means to meet the daily expenses. With the advent of Mahatma Gandi on the national scenario, calling the participation of youths in the freedom struggle, Dinkar too became a freedom fighter.
His poem ‘Gandhi’ revers the Father of the Nation and pay tribute to his inspiration.

देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ
“जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ ।
पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो ।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो !”

सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी का था, जिस ने हमें जन्म दिया था ।

तब भी हम ने गाँधी के
तूफ़ान को ही देखा,
गाँधी को नहीं ।

वे तूफ़ान और गर्जन के
पीछे बसते थे ।
सच तो यह है
कि अपनी लीला में
तूफ़ान और गर्जन को
शामिल होते देख
वे हँसते थे ।

तूफ़ान मोटी नहीं,
महीन आवाज़ से उठता है ।
वह आवाज़
जो मोम के दीप के समान
एकान्त में जलती है,
और बाज नहीं,
कबूतर के चाल से चलती है ।

गाँधी तूफ़ान के पिता
और बाजों के भी बाज थे ।
क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे

Though known categorically for his Veer Ras poems, he used to call himself a Bad Gandhian for justifying the use of violence as a measure to teach the unruly.
He was a poet who regarded inaction as equivalent to the sin and his poems were and are a constant source of motivation for the flagging morale.
The lines in his poem Samar Shesh hai clearly elucidate his dislike for the onlookers

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

Reading Dinkar and his philosophies spread all over his literature during junior classes, made a lasting impression on our young minds. His structuring of Poem in proper meter, use of tough yet precise Hindi lexicons, and a rhyming scheme which usually made us to sing the poems in ‘OJPURNA WAY’. The recitation of poem was enough to spike our patriotism and motivation to serve the country.

A vociferous critic of vanity, the starting Stanza of his poem ” Shakti Aur Saundarya ” became the rallying point of careless boys ( wrt looks) –
तुम रजनी के चाँद बनोगे ?
या दिन के मार्त्तण्ड प्रखर ?
एक बात है मुझे पूछनी,
फूल बनोगे या पत्थर ?

तेल, फुलेल, क्रीम, कंघी से
नकली रूप सजाओगे ?
या असली सौन्दर्य लहू का
आनन पर चमकाओगे ?

पुष्ट देह, बलवान भूजाएँ,
रूखा चेहरा, लाल मगर,
यह लोगे ? या लोग पिचके
गाल, सँवारि माँग सुघर ?

The one art he was quite at home was to write kavya Sangrahs, and he wrote a lot of them. Dealing with historical and mythological issues with his own interpretation brought out best in him. Rashmirathi, based on the grandest epic of the world Mahabharata proves his brilliance once and for all.

All the couplets not only tell you the story but also teach you many experiences of life all along.
The way Pandavas are motivated to fight against Kaurav and by telling them the difference between cowardice and piety,

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

The way Krishna warns Duryodhan and his detailing makes you feel the grandeour of Lord Kishna
हरि ने भीषण हुंकार किया,

अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,

भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,

हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,

यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,

मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,

संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,

भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,

मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,

सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,

मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,

नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,

शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,

शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,

शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,

हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,

गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,

यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,

पहचान, कहाँ इसमें तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,

पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,

मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,

फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,

साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,

हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,

छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,

जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,

पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,

वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,

मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,

अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,

जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,

बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,

विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।

फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,

विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,

सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,

हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,

चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,

धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,

दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

But the real gem of the poem comes during Krhna Karna Samwad whereShri Krishna wants to turn Krn in their favor by offering him Kingship. To which the Karn replies
“कुल-गोत्र नही साधन मेरा,

पुरुषार्थ एक बस धन मेरा.
कुल ने तो मुझको फेंक दिया,

मैने हिम्मत से काम लिया

“धनराशि जोगना लक्ष्य नहीं,

साम्राज्य भोगना लक्ष्य नहीं.
भुजबल से कर संसार विजय,

अगणित समृद्धियों का सन्चय,
“वैभव विलास की चाह नहीं,

अपनी कोई परवाह नहीं,
बस यही चाहता हूँ केवल,

दान की देव सरिता निर्मल,
करतल से झरती रहे सदा,

निर्धन को भरती रहे सदा.

“मुझसे मनुष्य जो होते हैं,
कंचन का भार न ढोते हैं,
पाते हैं धन बिखराने को,
लाते हैं रतन लुटाने को,
जग से न कभी कुछ लेते हैं,
दान ही हृदय का देते हैं.

“प्रासादों के कनकाभ शिखर,

होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ ना होता है,
कंचन पर कभी न सोता है.
रहता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में.

“होकर सुख-समृद्धि के अधीन,

मानव होता निज तप क्षीण,
सत्ता किरीट मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज हरण.
नर विभव हेतु लालचाता है,
पर वही मनुज को खाता है.

“चाँदनी पुष्प-छाया मे पल,

नर भले बने सुमधुर कोमल,
पर अमृत क्लेश का पिए बिना,
आताप अंधड़ में जिए बिना,
वह पुरुष नही कहला सकता,
विघ्नों को नही हिला सकता.

And though he is known for his spirited poems , one of my favorite remains his thoughtful and heart wrenching poem pardeshi
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?
भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी!
सृजन-बीच संहार छिपा, कैसे बतलाऊं परदेशी?
सरल कंठ से विषम राग मैं कैसे गाऊँ परदेशी?

एक बात है सत्य कि झर जाते हैं खिलकर फूल यहाँ,
जो अनुकूल वही बन जता दुर्दिन में प्रतिकूल यहाँ।
मैत्री के शीतल कानन में छिपा कपट का शूल यहाँ,
कितने कीटों से सेवित है मानवता का मूल यहाँ?
इस उपवन की पगडण्डी पर बचकर जाना परदेशी।
यहाँ मेनका की चितवन पर मत ललचाना परदेशी !
जगती में मादकता देखी, लेकिन अक्षय तत्त्व नहीं,
आकर्षण में तृप्ति उर सुन्दरता में अमरत्व नहीं।
यहाँ प्रेम में मिली विकलता, जीवन में परितोष नहीं,
बाल-युवतियों के आलिंगन में पाया संतोष नहीं।
हमें प्रतीक्षा में न तृप्ति की मिली निशानी परदेशी!
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?

महाप्रलय की ओर सभी को इस मरू में चलते देखा,
किस से लिपट जुडाता? सबको ज्वाला में जलते देखा।
अंतिम बार चिता-दीपक में जीवन को बलते देखा ;
चलत समय सिकंदर -से विजयी को कर मलते देखा।

सबने देकर प्राण मौत की कीमत जानी परदेशी।
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?
रोते जग की अनित्यता पर सभी विश्व को छोड़ चले,
कुछ तो चढ़े चिता के रथ पर, कुछ क़ब्रों की ओर चले।

रुके न पल-भर मित्र, पुत्र माता से नाता तोड़ चले,
लैला रोती रही किन्तु, कितने मजनू मुँह मोड़ चले।

जीवन का मधुमय उल्लास,
औ’ यौवन का हास विलास,
रूप-राशि का यह अभिमान,
एक स्वप्न है, स्वप्न अजान।
मिटता लोचन -राग यहाँ पर,
मुरझाती सुन्दरता प्यारी,
एक-एक कर उजड़ रही है
हरी-भरी कुसुमों की क्यारी।
मैं ना रुकूंगा इस भूतल पर
जीवन, यौवन, प्रेम गंवाकर ;
वायु, उड़ाकर ले चल मुझको
जहाँ-कहीं इस जग से बाहर

मरते कोमल वत्स यहाँ, बचती ना जवानी परदेशी !
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?

A poet par excellence for whom writing anything is like showing candle to the sun i’d like to end the post with two lines of his describing the poets

तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है
और हम अंधेरे में
जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।
असल में हम कवि नहीं,
शोक की संतान हैं।
हम गीत नहीं बनाते,
पंक्तियों में वेदना के
शिशुओं को जनते हैं।
झरने का कलकल,
पत्तों का मर्मर
और फूलों की गुपचुप आवाज़,
ये गरीब की आह से बनते हैं।

Huge applause 👏👏👏👏👏 for your efforts Prankies.

Thanks for sharing so much about dinkar ji…👌👌👌

Keep scribbling 

Happy reading readers

Yours loving warrior 

Naina

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6 thoughts on “Ramdhari Singh Dinkar

    1. So you are back on the page ! Welcome again. Two of the hindi poets immensely contributed in the contemporary hindi lit. Dinkar and Bachchan and I’m quite fond of their poems. I with this article I just want to show the geniuses of Dinkar to our readers who might be unaware of it . Thanks miki for having patience to read it

      Liked by 1 person

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