किरणें   ‘आपके’ आफ़ताब की- 2


न झर रही, न झर चुकी हैं

 पंखुड़ियाँ   ‘इस गुलाब’ की

तो क्या ज़रूरत है   ऐ जानिब

” इन   ‘अश्कों के सैलाब’ की” 


तो क्यों फ़िकर हरसू करें हम

   हर  बात  हो   सवाब की

हैं हमेशा संग हमारे

  किरणेंं   ‘आपके’ आफ़ताब की


तो क्यों डरें और क्यों हम सहमें

क्यों  ‘गफ़लत’ में पड़ जाएँ हम

‘अश्क’  के अनमोल मोती

  व्यर्थ  क्यूँ  बहाएँ  हम


दें खुशी हर एक जन को

 वजह हम बनें मुस्कान की

आगे रखें सदा नेकियाँ  ‘उनकी’

 आखिर है बात ये ‘उनकी’  शान की


जान लो, अब बातें पढ़ लो

 ‘उनके’  दिल की  उस किताब की

हैंं  हमेशा संग हमारे

 किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की


“आशुसुधा”  चाहें सदा

महक  ‘आपके’  मेहताब की

हैं हमेशा संग हमारे

 किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की

रहें हमेशा  संग हमारे

 किरणेंं  ‘आपके’ आफ़ताब की!!!


   आपके शुभाशीष हेतु सदा प्रतीक्षित 

             –       आशुसुधा

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5 thoughts on “ किरणें   ‘आपके’ आफ़ताब की- 2

  1. Agr zhr bhi gai toh kya gham hai
    Yahi to dastur hai is mausam-e-mizaz ki….

    Jaise sharad ritu me patte naye aate hain…
    Waise hi fir se khilengi pankhudiya ye gulab ki

    Liked by 1 person

    1. Yeah, true

      This is actual her inspiration,
      She jst gv a vision by her wonderful thought किरणें आपके आफ़ताब की
      Then only, i became succcessful doing this….
      So the total credit goes to her only…..
      Thanks Warrior for being the Inspiration 👍👍 🙏🙏

      Liked by 3 people

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