किरणें   ‘आपके’ आफ़ताब की- 2

न झर रही, न झर चुकी हैं  पंखुड़ियाँ   'इस गुलाब' की तो क्या ज़रूरत है   ऐ जानिब " इन   'अश्कों के सैलाब' की"  तो क्यों फ़िकर हरसू करें हम    हर  बात  हो   सवाब की हैं हमेशा संग हमारे   किरणेंं   'आपके' आफ़ताब की तो क्यों डरें और क्यों हम … Continue reading  किरणें   ‘आपके’ आफ़ताब की- 2