Desh humara…..


Written way back in 1959 for the movie ‘ Didi’, by one of the superb lyricist our bollywood ever had, Mr sahir ludhinawi. 

Just listen to the song, the innocent questions by the young children and thoughtful answers by their teacher. We need many teachers like him in current times 
हमने सुना था एक है भारत सब मुल्कों से नेक है भारत लेकिन जब नजदीक से देखा सोच समझ कर ठीक से देखा

हमने नक्शे और ही पाए बदले हुए सब तौर ही पाए

एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है

आप ने जो कुछ हम को पढाया, वह तो कही भी नज़र न आया 

जो कुछ मैंने तुम को पढाया, उसमे कुछ भी झूठ नहीं

           भाषा से भाषा न मिले तो इसका मतलब फूट नहीं

          इक डाली पर रह कर जब फूल जुदा है पात जुदा

          बुरा नहीं गर यूँ ही वतन में धर्म जुदा हो जात जुदा |
वही है जव कुरआन का कहना, जो है वेद पुरान का कहना

फिर ये शोर – शराबा क्यों है, इतना खून – खराबा क्यों है ?
         सदियों तक इस देश में बच्चो रही हुकूमत गैरों की

अभी तलक हम सबके मुँह पर धुल है उनके पैरों की,

   लडवाओ और राज करो, यह उन लोगो की हिकमत थी

          उन लोगों की चल में आना हम लोगों की जिल्लत थी,

       यह जो बैर है इक दूजे से यह जो फुट और रंजिश है

         उन्ही विदेशी आकाओं की सोची समझी बखशिश है |
 कुछ इन्सान ब्रहान क्यों है, कुछ इंसान हरिजन क्यों है,

एक की इतनी इज्जत क्यों है, एक की इतनी ज़िल्लत क्यों है ?
धन और ज्ञान को ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा

मेहनत और गुलामी को कमजोरों की तक़दीर कहा,

इन्सानों का यह बटवारा वहशत और जहालत है

जो नफ़रत की शिक्षा दे वह धर्म नहीं है , लानत है,

      जन्म से कोई नीच नहीं है, जन्म से कोई महान नहीं

      

करम से बढ़कर किसी मनुष्य की कोई भी पहचान नहीं |
ऊँचे महल बनाने वाले फुटपाथों पर क्यों नहीं रहते है,

दिन भर मेहनत करने वाले फाकों का दुख क्यों सहते है ?
खेतों और मिलों पर अब तक धन वालों का इजारा है

हमको अपना देश प्यारा, उन्हें मुनाफा प्यारा है,

उनके राज में बनती है हर चीज़ तिजारत की खातिर

अपने राज में बना करेगी सब की जरुरत की खातिर,
अब तो देश में आज़ादी है अब क्यों जनता फरियादी है,

कब जएगा दौर पुराना, कब आएगा नया जमाना ?
सदियों की भूख और बेकारी क्या इक दिन में जाएगी,

इस उजड़े गुलशन पर रंगत आते आते आएगी,

ये जो नये मनसूबे है ये जो नई तामीरे है 

आने वाली दौर की कुछ धुधली -धुधली तस्वीरे है,

तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे

नवयुग आप नहीं आएगा नवयुग को तुम लाओगे । 

The way the song started and the kid asked kindly reply in poem…I was reminded of me and you Prankies…Exactly in the same way I ask you and exactly the same way you reply..This became quite a personal comment but I couldn’t stop myself from commenting…So, thanks a ton for doing this to me and that too in poems which I read with greater interest because replies happen to be poems.

Anyways coming to song..Thanks for sharing..How relevant is this one in 2017 though penned in 1959 and all the hopes and replies by the teacher is equally relevant as the questions by students are.

A great start for today ✌

Keep scribbling Prankies

Happy reading readers

Yours loving warrior

Naina

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9 thoughts on “Desh humara…..

  1. As naina said… Relevant to today’s era rather than late 60s….

    It clearly depicts the present scenarios… Or i can say we have unity in diversity….

    Liked by 1 person

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