आखिर कर्ज़ क्या है



शाम का वक़्त था आसमान सूरज की लालिमा लिये दिन को खुद मे समेट कर अलविदा कहे रहा था, हुमुस जैसा मौसम था माथे का पसीना गल को छूते हुए गर्दन से गुजरते हुए मेरा शर्ट को भिंगो रहा था। मै अपने घर के छत पर गया हुमस भरी गर्मी से राहत के लिये पर उस दिन मौसम से शीतलता ऐसा गायब थी जैसा गधे के सर से सिंग।
कमरे के अंदर पंके बेकार और एसी एक आम आदमी अफोर्ड नहीं कर सकता है, माध्यम वर्गी परिवार मै तो जरूरत ही ज़िंदगी है तभी तो मैंने एपल के आईफोन की इच्छा त्याग मैंने एक 4 हज़ार का फोन लिया शायद किसी शांत ने ठीक ही कहा है “ज़रूरत तो फकीर की भी पूरी हो जाती है और इच्छा राजा की भी अधूरी रहे जाती है”।
मै छत पे चहल कदमी कर रहा था, अपनी शर्ट की मैंने ऊपर वाली बटन भी खोल दी पर बेमन मौसम का कोई उपकार नहीं हुआ। मै एक कोना से दूसरा कोना नाप रहा था छत पे तभी मेरी नज़र घर के द्वार के पास जो सड़क जाती है उसपे पड़ी। मेरी नजरे रुकी उन नन्हें खाली पैरो पे जा कर जो गरम सड़क पर चलने पे हिचकिचा रही थी पर मजबूर कदम उनके आगे जाने को परतीबद्ध थे। मेरी नज़ारे थोड़ी ऊपर गयी। उसने गंदी सी एक फटी जीन्स पहन राखी थी जब मैंने उसे पूरा देखा तो उसकी बनयन आधी पटी और मैली थी।
उसके कंधे पे एक बस्ता तांगा था उसमे क्या समान थी पता नहीं मुझे। वो लड़का मासूम सा उम्र उसकी 6 से 8 साल के बीच मै होगी। उसके चेहरा पे पसीना था और आंखो मै शोक। मैंने उसे रोका ‘ओए छोटे रुक” मैंने उससे आवाज़ मारी।
वो धीमी चल रहा था पर जैसा ही उसने मेरी आवाज़ सुनी वो तेज़ चलने लगा बिना मेरा तरफ देखे ‘अरे रुको कुछ देना है’ मैंने फिर से आवाज़ लगाई।
इस बार वो रुका ‘भैया मैंने कुछ नहीं नहीं चुराया है मेरा बस्ते मै कचरा मै चुन चुन कर बेचता हु उससे बस’।
‘हाँ तो भाई मैंने कब कहा की तुमने कुछ चुराया है तुम वही रुको मै आता हु’ मै दौड़ पड़ा नीचे।
मै रोसाइ घर मै गया वह से ब्रेड की पॉकेट निकाली और पानी बोतल का साथ मै लेकर घर से निकाला। मैंने देखा वो मेरे घर के द्वार पे खड़ा है।
‘तुम्हारा नाम क्या है? मैंने पूछा।
‘विक्की’ उसने कहा ब्रैड की पॉकेट के तरफ देखते हुए।
‘पापा और माँ क्या करते है?
‘माँ मजदूर है पापा बीमार पड़ गये है’ विक्की ने कहा ब्रैड की पॉकेट को एकटक देखते हुए।
‘तुम स्कूल नहीं जाते हो? मैंने पूछा।
‘पहले जाता था जब से पापा बीमार पड़े है तब से नहीं जाते है’ विक्की की नज़ारे ब्रैड की पॉकेट पे अटक सी गयी थी जैसे।
‘लो यह तेरा लिये’ मैंने उसे ब्रैड और पानी का बोतल दे दिया। और जो मैंने खुसी देखि उसकी चेहरे पे वो बहुत ही बहूमूल्य थी।
उसने मुस्कान दे कर मुझसे ब्रैड का पॉकेट ले लिया और पनि का बोतल पी कर वापस कर दिया और आगे बड़ गया। मैंने भी दरवाजा बंद कर लिया और घर के अंदर अरहा था तभी मैंने दरवाजे पे दस्तक सुनी मैंने वापस जा कर दरवाजा खोला।
‘अरे विक्की तुम’
‘थैंक यू भैया’ और वो दौड़ पड़ा इतना कहता हुए मै भी अपने मै हसा और दरवाजा बंद कर वापस छत पे जा बैठे, मैंने देखा विक्की बहुत दूर जा चुका है और ब्रैड का खाली पॉकेट रोड पे पड़ा था, 4 ब्रैड की तुकोड़ो से मै उसकी गरीबी तो मिटा सका इतना संतोष जरूर था एक पल की खुसी उससे दे कर खुद के लिये दो पल की खुसी उससे उधार ले लिया।
थोड़ा खुसी बटने मै हर्ज़ क्या है
कोई बताओ मुझे यह दुख का आखिर मर्ज क्या है
कभी आईने मै देख कर खुद को सोचना आखिर तेरा फर्ज़ क्या है
दो पल मै अगर रीस्ते बनते है
तो उससे बननाने मै आखिर कर्ज़ क्या है
-Mr. Passionate ( कुमार कौस्तुभ)

So many things you have expressed well in this post kaustubh.

So, I am confused from where should I start….

4 ब्रैड की तुकोड़ो से मै उसकी गरीबी तो मिटा सका इतना संतोष जरूर था

small things can create 9 letter long happiness  

एक पल की खुसी उससे दे कर खुद के लिये दो पल की खुसी उससे उधार ले लिया।

When we give,it comes back getting doubled.
थोड़ा खुसी बटने मै हर्ज़ क्या है

exactly harz kya hai …you loose nothing when you spread happiness!

कोई बताओ मुझे यह दुख का आखिर मर्ज क्या है

aisa koi marz ni jo khusiyo se na mitaya ja sake
कभी आईने मै देख कर खुद को सोचना आखिर तेरा फर्ज़ क्या है

yes responsibilities are not to be complained and handled forcefully, ask yourself and then take it yourself

दो पल मै अगर रीस्ते बनते है
तो उससे बननाने मै आखिर कर्ज़ क्या है
The best is the ending Relations don’t always leave you with liabilities…keep open heart, don’t hesitate to befriend people.

I think you have already amplified my closing line..Keep spreading love people!

Keep scribbling Mr. Passionate

Happy reading readers

Yours loving warrior

Naina 

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