नवरात्रि के तीसरे दिन होती है माँ चंद्र्घंटा की उपासना


I remember the days;
The days – white and black
And got mingled; they both
Turning to a grey deck

Likewise I encountered
People in various hues
Like chameleon they were
Changed colours after use

So sitting alone now
I too wonder
Why obsessed with colours
Why to them we pander

And am I different
Or am I the same
I too might be viewed in
Blackish or whitish frame

The black , white and grey
Are just notions of mind
And to these notions our
Judgements are entwined

We all are just a sundry
Shades of grey
And to idea of black and white
We often fell prey


My Chess board

Has both blacks and whites

I Don’t know who wants what

Every dice means something

There are even hidden secrets

There are hidden moves

Same person appears

Black and also white

at different instances

Don’t know whom to trust

May be finding trust is impossible

In this game called ‘Satranj’

Each one had a purpose

And every other is just

“used” in name of trust

Winning and

proving perfect is so necessary

Fake emotions exists

You have to play it

even if you don’t want to

Because all others are playing

Tit for tat

Player who plays with mind cunningly above all “stands”🖤

आज भी है

कितने बरस बीत गए

तरसती नज़र क्यों आज भी है

रास्ते ही अलग हो गए तो

दिल में क्यों धड़कते आज भी है

खुली किताब हूँ मैं

पर दफन मेरे सीने में कुछ राज़ क्यों है

दरख़्त कबके सूख गए

बाग़ मेंखुशबू क्यों आज भी है

निशां न हो एक भी लेकिन

जख्मों में ‘मुंतशिर’ दर्द आज भी है

Painless arguments

Speaking without thinking

And Arguing painlessly

With you for hours

And finally convincing you

Or getting convinced with you

And reaching a conclusion

That I am correct to an extent

Even when I was completely wrong

Are days I really miss daddy!

Those healthy arguments

can’t everywhere exist

Now that I have grown

And reached to a state

Where I can keep quiet

And let things go

And not argue

even when there is pain overflow

May be you would be happy

To see me grow

Or may be it is you who is creating

Conditions for me to mature

Or may be I still argue with you

In my mind,heart and soul

You still argue and send me answers

From a place where you have gone

Happiness is having

A permanent blessings

From heaven

How many thanks you owe

Happiness is having grown

From a part of you

To almost into you

And may be similar to you!


is having painless arguments

With free open minded father

Like you

Happy bday papa!

Happy reading everyone

Yours loving warrior


माँ तुम बहुत याद आती हो…

आँखों के किनारे पर आ कर यूँ ही ठहर सी जाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

सुबह का अलार्म और रात की लोरी बन जाती हो , माँ तुम बहुत याद आती हो

सर में दर्द हो तो मरहम और दिल में दर्द हो तो दुआ बन जाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

नींद ना आने पर सिराहना और बीमार पड़ने पर डॉक्टर बन जाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

तनहा रहू तो दोस्त, परेशान रहू तो सलाहकार बन जाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

समझ ना आए तो टीचर और गलती करने पर सब से बचाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

जादू की तरह एक पल में सब ठीक कर जाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

क्यों कर दिया मुझे खुद से इतना दूर की आँखे खुलते ही तुम ओझल सी हो जाती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो

अब तो बस पलके भीगा कर होठों पर मुस्कान छोड़ जाती हो, माँ ….तुम बहुत याद आती हो….

Add some more lines in this… I don’t have much of words

Thanks & Regards


कलम से…

एक बेधड़क सी लड़की डर कर जीने लगी

खाना तो क्या साँसे भी पूछ कर लेने लगी

शिखर पर पहुँच कर फिर शून्य पर आ गई

सुनी गलियों को अब वो यूँ ही निहारने लगी

समझ नहीं आ रहा कि उसे ऐसे बंधन में क्यों बाँध दिया

समाज के डर से उसके माता पिता ने उससे उसका बचपन छीन लिया

अपनी इच्छाओं को मार कर आज उसने भी जीना सीख लिया

समय के साथ आज उसने आँसू पीना भी सीख लिया

एक किनारे में बैठ कर घर को याद करना भी सीख लिया

तस्वीरों को देख कर ही मुस्कुराना सीख लिया

आज सोच रही है अगर उसकी माँ, भाभी बहन सब ने यही सहा

फिर क्यों उसे इस कड़वी सच्चाई से रखा क्यों जुदा

दहेज़ की बलि चढ़े या इच्छओं की , मारना तो है ही

क्यों उसे झूठे सपने दिखा कर इस शादी के प्रलोभन में फसा दिया

चुप रहना, कमरे में रहना उसकी फितरत में नहीं था

उसे हसना , बोलना और गुनगुनाना पसन्द था

आज घर की चौखट से पैर बहार नहीं रख सकती वो

जिसे हर रोज़ बहार आना जाना पसंद था

सब का ख़याल रखना सब कहते है , उसके खयाल की किसी को याद नहीं आती

सब की पसंद का ध्यान है उसे पर अपनी पसंद वो किसी को बता नहीं पाती

एक बोलने पर वो सब का कर देती पर उसका सुनने वाला कोई नहीं है

कहती रहती है महीने भर पहले से वो , तब भी उसकी इच्छाएँ पूरी नहीं हो पाती

पति के हिसाब से खुद को बदलो

घर के हिसाब से मन को बदलो

सब की उम्मीदों को पूरा करो

अपनी इच्छाओं को दफ़न करो

सब से मिल कर रहो

धीरे कहो ज़ोर से ना हँसो

बड़ो से बात भी मत करो

शर्म और लिहाज का लबादा ओढ़े रहो

मुस्कुराने का झूठा ढोंग चालू रखो

दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करो

Do let me know your views about marriage .

And correct me wherever I am wrong..☺☺☺👍

Thanks & Regards



बिंदास घुमने वाली लड़की आज एक पिन लाने के लिए भी किसी की मोहताज हैं

क्या ऐसा ही तुम्हारा समाज है

शादी नहीं ये एक बेकार सा रिवाज़ है

हर कोई उसके दिल को छल जाता है

और पूरा परिवार जश्न मनाता है

नकली सी मुस्कराहट ले कर उसका मन भी घबराता है

तुम दूसरे घर से आई हो , हर पल इस बात का एहसास दिलाता है

एक आँगन रोता है और उसी पल दूसरा आँगन ख़ुशियाँ मनाता है

ना जाने कैसा रिवाज़ है ये शादी का
जहाँ दो परिवार ना एक होता हैं और ना ही अलग कहलता है

After a long break

Back with this….Many more to say but, unable to collect the words…!!!

Let me know.. what else you can add in this… And correct me if I am wrong…☺☺

Thanks & Regards