Ramdhari Singh Dinkar

2014_9largeimg223_Sep_2014_061429670.jpg

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

  • Dinkar

Today, I lift my pen to pay my heartiest tribute to hail one of the greatest Hindi poet of all time, who by his fans is regarded as Rashtra Kavi. A Freedom Fighter, a gandhian, a social activist a poet and a Rajya Sabha MP, he was born on 23rd of September, 110 years ago in Munger district of Bihar. Born and brought up is a rustic environment with meagre means to meet the daily expenses. With the advent of Mahatma Gandi on the national scenario, calling the participation of youths in the freedom struggle, Dinkar too became a freedom fighter.
His poem ‘Gandhi’ revers the Father of the Nation and pay tribute to his inspiration.

देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ
“जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ ।
पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो ।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो !”

सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी का था, जिस ने हमें जन्म दिया था ।

तब भी हम ने गाँधी के
तूफ़ान को ही देखा,
गाँधी को नहीं ।

वे तूफ़ान और गर्जन के
पीछे बसते थे ।
सच तो यह है
कि अपनी लीला में
तूफ़ान और गर्जन को
शामिल होते देख
वे हँसते थे ।

तूफ़ान मोटी नहीं,
महीन आवाज़ से उठता है ।
वह आवाज़
जो मोम के दीप के समान
एकान्त में जलती है,
और बाज नहीं,
कबूतर के चाल से चलती है ।

गाँधी तूफ़ान के पिता
और बाजों के भी बाज थे ।
क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे

Though known categorically for his Veer Ras poems, he used to call himself a Bad Gandhian for justifying the use of violence as a measure to teach the unruly.
He was a poet who regarded inaction as equivalent to the sin and his poems were and are a constant source of motivation for the flagging morale.
The lines in his poem Samar Shesh hai clearly elucidate his dislike for the onlookers

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

Reading Dinkar and his philosophies spread all over his literature during junior classes, made a lasting impression on our young minds. His structuring of Poem in proper meter, use of tough yet precise Hindi lexicons, and a rhyming scheme which usually made us to sing the poems in ‘OJPURNA WAY’. The recitation of poem was enough to spike our patriotism and motivation to serve the country.

A vociferous critic of vanity, the starting Stanza of his poem ” Shakti Aur Saundarya ” became the rallying point of careless boys ( wrt looks) –
तुम रजनी के चाँद बनोगे ?
या दिन के मार्त्तण्ड प्रखर ?
एक बात है मुझे पूछनी,
फूल बनोगे या पत्थर ?

तेल, फुलेल, क्रीम, कंघी से
नकली रूप सजाओगे ?
या असली सौन्दर्य लहू का
आनन पर चमकाओगे ?

पुष्ट देह, बलवान भूजाएँ,
रूखा चेहरा, लाल मगर,
यह लोगे ? या लोग पिचके
गाल, सँवारि माँग सुघर ?

The one art he was quite at home was to write kavya Sangrahs, and he wrote a lot of them. Dealing with historical and mythological issues with his own interpretation brought out best in him. Rashmirathi, based on the grandest epic of the world Mahabharata proves his brilliance once and for all.

All the couplets not only tell you the story but also teach you many experiences of life all along.
The way Pandavas are motivated to fight against Kaurav and by telling them the difference between cowardice and piety,

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

The way Krishna warns Duryodhan and his detailing makes you feel the grandeour of Lord Kishna
हरि ने भीषण हुंकार किया,

अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,

भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,

हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,

यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,

मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,

संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,

भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,

मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,

सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,

मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,

नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,

शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,

शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,

शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,

हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,

गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,

यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,

पहचान, कहाँ इसमें तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,

पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,

मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,

फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,

साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,

हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,

छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,

जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,

पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,

वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,

मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,

अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,

जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,

बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,

विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।

फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,

विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,

सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,

हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,

चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,

धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,

दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

But the real gem of the poem comes during Krhna Karna Samwad whereShri Krishna wants to turn Krn in their favor by offering him Kingship. To which the Karn replies
“कुल-गोत्र नही साधन मेरा,

पुरुषार्थ एक बस धन मेरा.
कुल ने तो मुझको फेंक दिया,

मैने हिम्मत से काम लिया

“धनराशि जोगना लक्ष्य नहीं,

साम्राज्य भोगना लक्ष्य नहीं.
भुजबल से कर संसार विजय,

अगणित समृद्धियों का सन्चय,
“वैभव विलास की चाह नहीं,

अपनी कोई परवाह नहीं,
बस यही चाहता हूँ केवल,

दान की देव सरिता निर्मल,
करतल से झरती रहे सदा,

निर्धन को भरती रहे सदा.

“मुझसे मनुष्य जो होते हैं,
कंचन का भार न ढोते हैं,
पाते हैं धन बिखराने को,
लाते हैं रतन लुटाने को,
जग से न कभी कुछ लेते हैं,
दान ही हृदय का देते हैं.

“प्रासादों के कनकाभ शिखर,

होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ ना होता है,
कंचन पर कभी न सोता है.
रहता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में.

“होकर सुख-समृद्धि के अधीन,

मानव होता निज तप क्षीण,
सत्ता किरीट मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज हरण.
नर विभव हेतु लालचाता है,
पर वही मनुज को खाता है.

“चाँदनी पुष्प-छाया मे पल,

नर भले बने सुमधुर कोमल,
पर अमृत क्लेश का पिए बिना,
आताप अंधड़ में जिए बिना,
वह पुरुष नही कहला सकता,
विघ्नों को नही हिला सकता.

And though he is known for his spirited poems , one of my favorite remains his thoughtful and heart wrenching poem pardeshi
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?
भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी!
सृजन-बीच संहार छिपा, कैसे बतलाऊं परदेशी?
सरल कंठ से विषम राग मैं कैसे गाऊँ परदेशी?

एक बात है सत्य कि झर जाते हैं खिलकर फूल यहाँ,
जो अनुकूल वही बन जता दुर्दिन में प्रतिकूल यहाँ।
मैत्री के शीतल कानन में छिपा कपट का शूल यहाँ,
कितने कीटों से सेवित है मानवता का मूल यहाँ?
इस उपवन की पगडण्डी पर बचकर जाना परदेशी।
यहाँ मेनका की चितवन पर मत ललचाना परदेशी !
जगती में मादकता देखी, लेकिन अक्षय तत्त्व नहीं,
आकर्षण में तृप्ति उर सुन्दरता में अमरत्व नहीं।
यहाँ प्रेम में मिली विकलता, जीवन में परितोष नहीं,
बाल-युवतियों के आलिंगन में पाया संतोष नहीं।
हमें प्रतीक्षा में न तृप्ति की मिली निशानी परदेशी!
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?

महाप्रलय की ओर सभी को इस मरू में चलते देखा,
किस से लिपट जुडाता? सबको ज्वाला में जलते देखा।
अंतिम बार चिता-दीपक में जीवन को बलते देखा ;
चलत समय सिकंदर -से विजयी को कर मलते देखा।

सबने देकर प्राण मौत की कीमत जानी परदेशी।
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?
रोते जग की अनित्यता पर सभी विश्व को छोड़ चले,
कुछ तो चढ़े चिता के रथ पर, कुछ क़ब्रों की ओर चले।

रुके न पल-भर मित्र, पुत्र माता से नाता तोड़ चले,
लैला रोती रही किन्तु, कितने मजनू मुँह मोड़ चले।

जीवन का मधुमय उल्लास,
औ’ यौवन का हास विलास,
रूप-राशि का यह अभिमान,
एक स्वप्न है, स्वप्न अजान।
मिटता लोचन -राग यहाँ पर,
मुरझाती सुन्दरता प्यारी,
एक-एक कर उजड़ रही है
हरी-भरी कुसुमों की क्यारी।
मैं ना रुकूंगा इस भूतल पर
जीवन, यौवन, प्रेम गंवाकर ;
वायु, उड़ाकर ले चल मुझको
जहाँ-कहीं इस जग से बाहर

मरते कोमल वत्स यहाँ, बचती ना जवानी परदेशी !
माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?

A poet par excellence for whom writing anything is like showing candle to the sun i’d like to end the post with two lines of his describing the poets

तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है
और हम अंधेरे में
जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।
असल में हम कवि नहीं,
शोक की संतान हैं।
हम गीत नहीं बनाते,
पंक्तियों में वेदना के
शिशुओं को जनते हैं।
झरने का कलकल,
पत्तों का मर्मर
और फूलों की गुपचुप आवाज़,
ये गरीब की आह से बनते हैं।

Huge applause 👏👏👏👏👏 for your efforts Prankies.

Thanks for sharing so much about dinkar ji…👌👌👌

Keep scribbling 

Happy reading readers

Yours loving warrior 

Naina

Advertisements

Dear Whatsoever!!

Dear Whatsoever (you hardly matter now),

Remember those text messages we used to send each other when there was no WhatsApp

Remember those long phone calls when we did not had free calling facility

Remember the time when SMS pack was as important as food

I still have those messages archived

Remember the other day you texted that I am outspoken and straight forward kind of person

That you are the one kind man who can tolerate me and nobody else would ever do

Remember that you said you would never return to me

That you never wanted to talk to me ever in your life

That night I cried like I’ve never cried before for anything and anyone

I was ready to apologize to you for n number of times even knowing that it was never my mistake

I knew I fell for a wrong man at the wrong time

But guess what you’ve made me the girl I am today

And I’ll always be grateful for this act of yours

Because the next time I cry like this it will be for my family and myself

And not for some hot-headed who only listened to one side of the story

Thank you so much

PS: I still don’t have a filter in my mouth and people love me for that unlike you.

(Will never be) Yours
Survivor of the best heartbreak.

Brilliantly crafted..And completely outspoken..✌

I totally loved it💕

Keep scribbling Nazia

Some write-ups show frustrations,self respect , hidden stories,lesson learnt….all rolled in one…This one was that writeup

“Because the next time I cry like this it will be for my family and myself” and this was the best part.

Happy reading readers

Yours loving warrior

Naina

 किरणें   ‘आपके’ आफ़ताब की- 2

न झर रही, न झर चुकी हैं

 पंखुड़ियाँ   ‘इस गुलाब’ की

तो क्या ज़रूरत है   ऐ जानिब

” इन   ‘अश्कों के सैलाब’ की” 


तो क्यों फ़िकर हरसू करें हम

   हर  बात  हो   सवाब की

हैं हमेशा संग हमारे

  किरणेंं   ‘आपके’ आफ़ताब की


तो क्यों डरें और क्यों हम सहमें

क्यों  ‘गफ़लत’ में पड़ जाएँ हम

‘अश्क’  के अनमोल मोती

  व्यर्थ  क्यूँ  बहाएँ  हम


दें खुशी हर एक जन को

 वजह हम बनें मुस्कान की

आगे रखें सदा नेकियाँ  ‘उनकी’

 आखिर है बात ये ‘उनकी’  शान की


जान लो, अब बातें पढ़ लो

 ‘उनके’  दिल की  उस किताब की

हैंं  हमेशा संग हमारे

 किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की


“आशुसुधा”  चाहें सदा

महक  ‘आपके’  मेहताब की

हैं हमेशा संग हमारे

 किरणें  ‘आपके’ आफ़ताब की

रहें हमेशा  संग हमारे

 किरणेंं  ‘आपके’ आफ़ताब की!!!


   आपके शुभाशीष हेतु सदा प्रतीक्षित 

             –       आशुसुधा

मेरे नेह भरे “दो नैना”

है तुमसे मुझको नेह (स्नेह) बहुत

हो तुम ही मेरे नैना….

तुमसे है मुझको नेह बहुत

तुम ही मेरे  दो नैना…


तुम ही तो मेरे सब कुछ हो

हो तुम ही अब  सोना  सब गहना

है तुमपे ही सब  ज़िम्मेवारी

बस यही है तुमसे कहना….

 

है बनना तुमको ठण्डा झोंका

ख़ुश रहना   नित बहना,

जैसे उड़ते मस्त हो के  पन्छी

चिड़िया बाज़ तोता और मैना….

 

रखो खु़द पर विश्वास पूर्ण

कि सताए कभी कोई भय ना

किला सारा किया  तुम्हें सुपुर्द अब

कभी ना कहना, ना ना  मैं ना…..



हो जाते हैं उनके सभी स्वप्न साकार

आ जाता है जिन्हें सब सहना,

फिर होता है जीवन में सदा मंगल उनके

ऐसा विद्वानों – बुज़ुर्गों का है कहना……



तुमसे ही तो जीवन  मंगल  है

बस यही है तुमसे कहना,

है तुमसे मुझको  नेह  बहुत

      हो तुम ही मेरे  नैना…।।


तुमसे है मुझको नेह बहुत

   तुम ही मेरे    दो नैना . . . !!

कर दो मंगल सब  हे गोपाल (ईश्वर) अब

  यही, हाँ यही, बस यही है तुमसे कहना…..!!!

Some lines touch you so much that you become speechless….

This is such a thing for me..

Brilliant one Ashu👌

Thanks for these treasurable lines!

Happy reading readers

Yours loving warrior 

Naina


The Shipwreck

IMG_0211

Somewhere faraway in the sea
Lied a barren land
Unreachable and unchartered
A rugged lonely island

For years it remained so
Passer-by just ignored
Amidst all the noise
Quietly it snored

A storm rankled the sea
And trembled it wild
The water got too choppy
To sailors it beguiled

Ships were there, though few
And troubled they were for sure
With hope in their heart
Scampered towards the shore

Alas! All ship did wrecked
And cargos went down the sea
All but one did not survive
And miraculous it was to be
slowly inching on wood plank
To the shore he reached
Fainted though he was
The island was now breached

Days slowly passed by
The traveller got fit
And it was not in him
To just idly sit

With rocks he made his tools
And started a mission
Would fight against the nature’s wrath
And would bring it to submission

thus started the transformation
Of the barren land
And as in Robinson Crusoe
Gardens bloomed in sand

Slowly the rugged terrain
Blossomed in orchid
And plants grew where
Once there were no weeds
Meanwhile the traveller
Made himself an arc
And on that little ship
He will be off the mark

He bid adieu to island
A place close to his heart
But he must go on
For much he has to chart

Many lands he has to conquer
And many hearts to rule
And then only his potential
Be utilized to the full

Well written Prankies👌

Perfectly shows what life is…

Once barren becomes green and one who made it green has to leave it and go …

No one can stay forever with achievement but that again doesn’t mean he can not conquer further.

Awesome one👌👌👍

Happy reading

Yours loving warrior

Naina

My Diary or … …..

diary.jpg

Oh ! my dear diary
Where art thou
The quill with ink
Is waiting for you
It might be a thought
Or may be a song
Or my restlessness
Buried for long
You take it all
With no questions asked
And infront of you
I often get unmasked
And now out of sudden
You are nowhere to be seen
Hiding adroitly from my eyes (so) keen
This game of hide and seek
Despairs me a lot
And much more desperately
You are now sought
And an ephinany then strikes
Am I looking at places
When you are inside
Inside me all the time
The lub dub unmistakenly is yours
How foolish I was ofcourse
After those sleepless nights
Last, I’d sleep tight.

Yes I have experienced this before warriornaina.com started, now this has replaced my diary and best thing is my this diary is never lost.

Anyways… Beautiful poem Prankies..Everyone who writes can relate to it.

And this last lines..were very cute…

Inside me all the time
The lub dub unmistakenly is yours
How foolish I was ofcourse
After those sleepless nights
Last, I’d sleep tight.
Keep scribbling Prankies

Happy reading readers

Yours loving warrior 

Naina

رهاب الليل Nyctophobia

“I am not afraid of death but I am afraid of being alone.
Wait aren’t the two same”

Above lines were written on the Facebook wall of one of the martyrs of Kashmir.

The morning of January 1 to the world it was HAPPY NEW YEAR
For me it was the day of loosing the most beautiful soul on earth
As I walked in the hall where I spent most of the time watching TV
Was my little angel clad in crisp white cloth, sleeping peacefully
Tears came running down my cheeks
And then my superhero came and told you shouldn’t be crying, for she was an angel and was meant to be in heaven

In the corner I saw the wheel my world wailing as she lost her own flesh,the apple of her eye

The history repeated itself on the very day, fourteen years later

Same place was my inspiration laid down in same white cloth with glow on his face

That day I realized the true meaning of being alone,of being dead,of the grave which will be dark.

I am afraid of losing my comfortable bed and sleeping in mud surrounding by earthworms and snakes

Afraid of being buried six feet under the earth with tones of soil over me

Afraid of missing my favourite biryani as I’ll be the meal of crawling animals in the grave

Afraid of the night I wake up in sweat dreaming about all these

I am afraid,I really am!!

 

-Nazia Islam

Darkness

Dullness

Night 

Death 

And

Loneliness

Well expressed Nazia…✌

Sometimes I feel somethings frightens me

And sometimes I am sure it’s just my mind’s creation..

Somethings are meant to be solved by self introspection…Phobias are one among  them…If you want, you can win over them..Or else Phobias will stay with you forever.

Good write-up Nazia!👌

Keep scribbling.

Happy reading readers

Yours loving warrior 

Naina